♣♣♣ " ऊपर जिसका अंत नहीं उसे आसमां कहते हैं, और नीचे जिसका अंत नहीं उसे माँ कहते हैं..."

Saturday, 27 August 2011

रोचक हास्य: "प्रधानमंत्री निकम्मा है ."


एक बार एक आम आदमी जोर जोर से चिल्लारहा था, "प्रधानमंत्री निकम्मा है ."


पुलिस के एक सिपाही ने सुना और उस की गर्दन पकड़ के दो रसीद किये और बोला, "चल थाने, प्रधानमंत्री की बेइज्ज़ती करता है?"


वो बोला, "साहब मै तो कह रहा था फ़्रांस का प्रधानमंत्री निकम्मा है."


ये सुन कर सिपाही ने दो और लगाए और बोला, "साले,बेवक़ूफ़ बनता है! क्या हमे नहीं पता कहाँका प्रधानमंत्री निकम्मा है?"


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*** है ध्येय हमारा दूर सही पर साहस भी तो क्या कम है
हम राह अनेको साथी है कदमो मे अंगद का दम है
असुरो की लन्का राख करे वह आग लगाने आते है ॥
पग पग पर काटे बिछे हुये व्यवहार कुशलता हम मे है
विश्वास विजय का अटल लिये निष्ठा कर्मठता हम मे है
विजयी पुरखों की परम्परा अनमोल हमारी थाती है ॥..***!!!!!!


************एक भारतीय ********************

Sunday, 21 August 2011

सनसनीखेज: क्या वाकई सरकार अन्ना के सामने झुक गई है ?....!!!!!

    म जानते हैं की समाज में जब भी परिवर्तन की नींव डालने की कोशिशे की गयी हैं, उसके विरोधाभाष में कुछ न कुछ समस्याए जरुर आई हैं | मैं यहाँ अन्ना जी, बाबा रामदेव या कांग्रेस का न ही समर्थन कर रहा हु और ना ही उनको विरोध | किन्तु एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि, क्या वाकई सरकार अन्ना के सामने झुक गई है ? 
और अगर ऐसी बात है तो फ़िर अनशन किसलिये हो रहा है ? 

सरकार अन्ना के जन लोकपाल को स्विकार क्यो नही करती ? 

15 दिन के बाद सरकार मान जायेगी ? 

15 दिन के बाद क्या होगा ? 

अगर सरकार 15 के दिन के बाद उनकी बात मान सकती है तो अब क्यो नही मान लेती ?

क्यों इतने बडे जन सैलाब को कष्ट दे रही है ?

 एक बात यह भी देखिये की, उसी रामलिल मैदान के लिये राजी है, जहां स्वामी रामदेव जी ने अनशन की इजाजत मांगी थी । यह दोगला व्यवहार क्यो ? 
निचे दिए गए पहलुओ पर तनिक विचार करें...
कि, कही हम इस जनलोकपाल के चक्कर में कालेधन का मुद्दा और कांग्रेस के घोटाले वाले कारनामे भुल न जाये। मुझे नही लगता की, आम गरीब किसान जो आत्महत्या करने के कगार पर आ चुका है, वह जन लोकपाल के पास जाकर शिकायत कर पायेगा या उसकी भुखमरी और बेरोजगारी मिट जायेगी।


लोकायुक्त पहले भी नियुक्त किये जा चुके है और भ्रष्ट्राचार निवारण एजन्सीयां बनी हुई है। कोई उनके पास शिकायत करने नही जाता। यही हाल लोकपाल के साथ होगा।

यहाँ एक बात तो स्पस्ट दिखती है सरकार ने बाबा रामदेव को ४ जून को दिल्ही से हरिद्वार पहुँचाकर मीडिया को भारत निर्माण के नाम से चुप कर दिया. सरकार चाहती तो अन्ना हजारे के विषय में मिडिया को चुप करा कर रोक सकती थी पर सरकार ने ही राम लला मैदान की साफ सफाई कराकर आन्दोलन को और भी सफल बनाया जबकि बाबा रामदेव के समय मैदान में टेंकर की मदत से पानी डाल कर कीचड़ बनाने का प्रयाश किया गया. दाल में जरुर कुछ काला है.    

मेरे जेहन में कुछ सवाल है कोई मेरे इन सवालो का जबाब दे सकता है तो कह सकते हैं की अन्ना का समर्थन जायज है............

१- क्यों अन्ना ने भारत माता की तस्बीर का अपमान करके दूसरी तस्बीर बनायीं? 

२- क्यों अन्ना बाबा को मंच पर ना आने की सलाह देता है?

३- क्यों नहीं अभी कोई कोंग्रेस्सी पिल्ला भोंक रहा है अन्ना पर? कहाँ गया दिग्गी?

४- क्यों मीडिया अन्ना के अनसन को अगस्त क्रांति का नाम दे रही है जबकि इसी मीडिया ने बाबा के अनसन को ढोंग साबित करके उन्हें ढोंगी करार दिया?

५- अन्ना को इतना जन समर्थन मिल रहा है तो क्यों नहीं वो स्वदेशी और काले धन (स्विस बेंक में जमा काला धन) को भारत में लाने की मांग कर रहे हैं.?

६- अगर अन्ना को भगवा से इतनी नफरत है तो क्यों उन्होंने देशद्रोही मौलाना अग्निवेश को अपनी टीम का सदस्य बनाया है और रामदेव को समर्थन ना करने की सलाह देते हैं.?

७- क्या कभी अन्ना ने किसी कोंग्रेस्सी को निशाना बनाया है?

८- क्यों अन्ना गुजरात में जाकर मोदी के शासन की उपेक्षया करते हैं: कहते है गुजरात में शराब की बाढ़ बहती है लेकिन महारास्ट्र में उनको शराब तक की बू नहीं आती है?

९- क्यों नहीं अन्ना महारास्ट्र में किसानो की हो रही आत्महत्या पर चुप बैठे हैं? क्यों नहीं वो महारास्ट्र  सरकार (कोंग्रेस) को आईना दिखा रहे हैं?

१०- क्यों ngo को लोकपाल बिल के दायरे में नहीं लाना चाहते हैं?

११- अन्ना ने अब भारत माता की फोटो हटाकर गाँधी की फोटो लगा दी है क्यों? वे भारत माता के साथ साथ गाँधी जी की और दुसरे क्रन्तिकारी की भी फोटो लगा सकते थे. पर इसके लिए भारत माता की फोटो हटाने की क्या जरुरत पड़ी.

अगर आप पिछले कुछ दिनों से आज तक जैसे चेनल पर गौर करेंगे तो पता चलेगा की कैसे किशी को हीरो बनाये और कैसे किसीको जीरो.

 मिडिया सम्पूर्ण रित से पैसो के लिए कार्य कर्ता है. यह वही दिखाता है जो सरकार चाहती है.

जब तक सम्पुर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिये आंदोलन नही होता और उसमे सफ़लता नही मिलती तब तक सत्ता पर बैठे हुए भेडिये जनता का युं ही खुंन चुंसते रहेंगे।

हमे हमारा ''भारत ''चाहिये,'' इण्डिया'' नही, जो वास्तव मे गांवों मे बसता है।

Friday, 19 August 2011

सनसनीखेज: गज़ब ईमानदारी का गज़ब खुलासा...!!!!!

भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने वाली मुहिम में अब एक नया मोड़ आन खड़ा हुआ है | मैं यहाँ ना तो अन्ना जी को सपोर्ट कर रहा हु और ना ही सरकार की इस दोहरी राजनीती के ही समर्थन में हूँ | क्यूंकि इस देश को अपने स्वार्थ के लिए बेच देना इनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है| चूँकि इस देश को हम अपनी माँ का दर्जा देते है, इसे पूजते है, शरहद पर लड़ने वाले बाशिंदों में एक जज्बा होता है की वो अपनी माँ की आन पर कभी कोई आंच नहीं आने देंगे | मगर हम किस मातृभूमि की रक्षा के लिए शपथ खाएं | क्या आज़ादी और देश विभाजन के बाद का हिन्दुस्तान ऐसा होना चाहिए था, जहा लोकतंत्र होते हुए भी आरक्षण के आधार पर विद्यार्थियों के बीच जाती-वाद की नींव रखी जाती है| खैर, अन्ना की इंडिया अगेंस्ट करप्सन की यह निति कहाँ तक सही है, यह आप ही बताइए | मेरे ख्याल से तो गलत सदैव गलत ही होता है चाहे वह थोडा हो या ज्यादा...


एक रिपोर्ट:

          रामलीला मैदान में अभी-अभी खत्म हुई प्रेस कांफ्रेंस में अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने साफ़ और स्पष्ट जवाब देते हुए लोकपाल बिल के दायरे में NGO को भी शामिल किये जाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है. विशेषकर जो NGO सरकार से पैसा नहीं लेते हैं उनको किसी भी कीमत में शामिल नहीं करने का एलान भी किया. ग्राम प्रधान से लेकर देश के प्रधान तक सभी को लोकपाल बिल के दायरे में लाने की जबरदस्ती और जिद्द पर अड़ी अन्ना टीम NGO को इस दायरे में लाने के खिलाफ शायद इसलिए है, क्योंकि अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया,किरण बेदी, संदीप पाण्डेय ,अखिल गोगोई और खुद अन्ना हजारे भी केवल NGO ही चलाते हैं. अग्निवेश भी 3-4 NGO चलाने का ही धंधा करता है. और इन सबके NGO को देश कि जनता की गरीबी के नाम पर करोड़ो रुपये का चंदा विदेशों से ही मिलता है.इन दिनों पूरे देश को ईमानदारी और पारदर्शिता का पाठ पढ़ा रही ये टीम अब लोकपाल बिल के दायरे में खुद आने से क्यों डर/भाग रही है.भाई वाह...!!! क्या गज़ब की ईमानदारी है...!!!

इन दिनों अन्ना टीम की भक्ति में डूबी भीड़ के पास इस सवाल का कोई जवाब है क्या.....?????

जहां तक सवाल है सरकार से सहायता प्राप्त और नहीं प्राप्त NGO का तो मैं बताना चाहूंगा कि....

भारत सरकार के Ministry of Home Affairs के Foreigners Division की FCRA Wing के दस्तावेजों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2008-09 तक देश में कार्यरत ऐसे NGO's की संख्या 20088 थी, जिन्हें विदेशी सहायता प्राप्त करने की अनुमति भारत सरकार द्वारा प्रदान की जा चुकी थी.इन्हीं दस्तावेजों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2006-07, 2007-08, 2008-09 के दौरान इन NGO's को विदेशी सहायता के रुप में 31473.56 करोड़ रुपये प्राप्त हुये. इसके अतिरिक्त देश में लगभग 33 लाख NGO's कार्यरत है.इनमें से अधिकांश NGO भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों, भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों के परिजनों,परिचितों और उनके दलालों के है. केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों के अतिरिक्त देश के सभी राज्यों की सरकारों द्वारा जन कल्याण हेतु इन NGO's को आर्थिक मदद दी जाती है.एक अनुमान के अनुसार इन NGO's को प्रतिवर्ष न्यूनतम लगभग 50,000.00 करोड़ रुपये देशी विदेशी सहायता के रुप में प्राप्त होते हैं.

 इसका सीधा मतलब यह है की पिछले एक दशक में इन NGO's को 5-6 लाख करोड़ की आर्थिक मदद मिली. ताज्जुब की बात यह है की इतनी बड़ी रकम कब.? कहा.? कैसे.? और किस पर.? खर्च कर दी गई. इसकी कोई जानकारी उस जनता को नहीं दी जाती जिसके कल्याण के लिये, जिसके उत्थान के लिये विदेशी संस्थानों और देश की सरकारों द्वारा इन NGO's को आर्थिक मदद दी जाती है. इसका विवरण केवल भ्रष्ट NGO संचालकों, भ्रष्ट नेताओ, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों, भ्रष्ट बाबुओं, की जेबों तक सिमट कर रह जाता है.

भौतिक रूप से इस रकम का इस्तेमाल कहीं नज़र नहीं आता. NGO's को मिलने वाली इतनी बड़ी सहायता राशि की प्राप्ति एवं उसके उपयोग की प्रक्रिया बिल्कुल भी पारदर्शी नही है. देश के गरीबों, मजबूरों, मजदूरों, शोषितों, दलितों, अनाथ बच्चो के उत्थान के नाम पर विदेशी संस्थानों और  देश में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के विभिन्न सरकारी विभागों से जनता की गाढ़ी कमाई के दसियों हज़ार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष लूट लेने वाले NGO's की कोई जवाबदेही तय नहीं है. उनके द्वारा जनता के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के भयंकर दुरुपयोग की चौकसी एवं जांच पड़ताल तथा उन्हें कठोर दंड दिए जाने का कोई विशेष प्रावधान नहीं है.
 लोकपाल बिल कमेटी में शामिल सिविल सोसायटी के उन सदस्यों ने जो खुद को सबसे बड़ा ईमानदार कहते हैं और जो स्वयम तथा उनके साथ देशभर में india against corruption की मुहिम चलाने वाले उनके अधिकांश साथी सहयोगी NGO's भी चलाते है लेकिन उन्होंने आजतक जनता के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के दसियों हज़ार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष लूट लेने वाले NGO's के खिलाफ आश्चार्यजनक रूप से एक शब्द नहीं बोला है, NGO's को लोकपाल बिल के दायरे में लाने की बात तक नहीं की है.
इसलिए यह आवश्यक है की NGO's को विदेशी संस्थानों और देश में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के विभिन्न सरकारी विभागों से मिलने वाली आर्थिक सहायता को प्रस्तावित लोकपाल बिल के दायरे में लाया जाए |


♣♣♣ देखते हैं! क्या होता है इस देश का ???

एक गाँधी देश बांटकर चले गए नेहरू प्रेम में... और अब पूरा देश बंट रहा है...

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Thursday, 18 August 2011

जानिए! अन्ना हजारे के बारे में....

ब तक हम अन्ना जी का सिर्फ नाम सुनते आ रहे है, लेकिन क्या हममें सभी को पता है की अन्ना जी कौन है, और उनकी जीवनी क्या है... तो आइये जानते है भ्रष्टाचार के खिलाफ बुलंद आवाज उठाने वाले इन समाजसेवी के बारे में...


भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन में आम आदमी को जोड़ने वाले 73 साल के सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे का मूल नाम किसन बापट बाबूराव हज़ारे है.
अन्ना हज़ारे भारत के उन चंद नेताओं में से एक हैं, जो हमेशा सफेद खादी के कपड़े पहनते हैं और सिर पर गाँधी टोपी पहनते हैं.
उनका जन्म 15 जून, 1938 को महाराष्ट्र के भिंगारी गांव के एक किसान परिवार में हुआ. उनके पिता का नाम बाबूराव हज़ारे और मां का नाम लक्ष्मीबाई हजारे है. अन्ना के छह भाई हैं. अन्ना का बचपन बहुत ग़रीबी में गुज़रा.
परिवार की आर्थिक तंगी के चलते अन्ना मुंबई आ गए. यहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की. कठिन हालातों में परिवार को देख कर उन्होंने परिवार का बोझ कुछ कम करने के लिए फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रूपए महीने की पगार पर काम किया.

सेना में भर्ती

अन्ना
भारत-चीन युद्ध के बाद सरकार की अपील पर अन्ना सेना में बतौर ड्राइवर भर्ती हुए थे.
वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद सरकार की युवाओं से सेना में शामिल होने की अपील पर अन्ना 1963 में सेना की मराठा रेजीमेंट में बतौर ड्राइवर भर्ती हुए थे.
1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अन्ना हज़ारे खेमकरण सीमा पर तैनात थे. 12 नवंबर 1965 को चौकी पर पाकिस्तानी हवाई बमबारी में वहां तैनात सारे सैनिक मारे गए. इस घटना ने अन्ना की ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया.
घटना के 13 साल बाद अन्ना सेना से रिटायर हुए लेकिन अपने जन्म स्थली भिंगारी गांव भी नहीं गए. वे पास के रालेगांव सिद्धि में रहने लगे.
1990 तक हज़ारे की पहचान एक ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता हुई, जिसने अहमदनगर जिले के रालेगांव सिद्धि को अपनी कर्मभूमि बनाया और विकास की नई कहानी लिख दी.

आदर्श गांव

इस गांव में बिजली और पानी की ज़बरदस्त कमी थी. अन्ना ने गांव वालों को नहर बनाने और गड्ढे खोदकर बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए प्रेरित किया और ख़ुद भी इसमें योगदान दिया.
अन्ना के कहने पर गांव में जगह-जगह पेड़ लगाए गए. गांव में सौर ऊर्जा और गोबर गैस के जरिए बिजली की सप्लाई की गई.
इसके बाद उनकी लोकप्रियता में तेजी से इज़ाफा हुआ.
1990 में 'पद्मश्री' और 1992 में पद्मभूषण से सम्मानित अन्ना हज़ारे को अहमदनगर ज़िले के गाँव रालेगाँव सिद्धि के विकास और वहां पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए विभिन्न तरीक़ों का इस्तेमाल करने के लिए जाना जाता है.

'भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन'

अन्ना
भ्रष्टाचार के धुर विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर पहचान नब्बे के दशक में बनी
अन्ना की राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के धुर विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर पहचान नब्बे के दशक में बनी जब उन्होंने 1991 में 'भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन' की शुरूआत की.
महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा की सरकार के कुछ 'भ्रष्ट' मंत्रियों को हटाए जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की. ये मंत्री थे- शशिकांत सुतर, महादेव शिवांकर और बबन घोलाप.
अन्ना हज़ारे ने उन पर आय से ज़्यादा संपत्ति रखने का आरोप लगाया था.
सरकार ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन हारकर दो मंत्रियों सुतर और शिवांकर को हटाना ही पड़ा. घोलाप ने उनके खिलाफ़ मानहानि का मुकदमा कर दिया.
लेकिन अन्ना इस बारे में कोई सबूत पेश नहीं कर पाए और उन्हें तीन महीने की जेल हुई. हालांकि उस वक़्त के मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने उन्हें एक दिन की हिरासत के बाद छोड़ दिया.
एक जाँच आयोग ने शशिकांत सुतर और महादेव शिवांकर को निर्दोष बताया. लेकिन अन्ना हज़ारे ने कई शिवसेना और भाजपा नेताओं पर भी भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाए.

सरकार विरोधी मुहिम

रालेगाँव सिद्धी गांव में अन्ना इसी मंदिर में रहते हैं.
2003 में अन्ना ने कांग्रेस और एनसीपी सरकार के कथित तौर पर चार भ्रष्ट मंत्रियों-सुरेश दादा जैन, नवाब मलिक, विजय कुमार गावित और पद्मसिंह पाटिल के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी और भूख हड़ताल पर बैठ गए.
हज़ारे का विरोध काम आया और सरकार को झुकना पड़ा. तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने इसके बाद एक जांच आयोग का गठन किया.
नवाब मलिक ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया. आयोग ने जब सुरेश जैन के ख़िलाफ़ आरोप तय किए तो उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया.
1997 में अन्ना हज़ारे ने सूचना के अधिकार क़ानून के समर्थन में मुहिम छेड़ी. आख़िरकार 2003 में महाराष्ट्र सरकार को इस क़ानून के एक मज़बूत और कड़े मसौदे को पास करना पड़ा.
बाद में इसी आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन का रूप लिया और 2005 में संसद ने सूचना का अधिकार क़ानून पारित किया.
कुछ राजनीतिज्ञों और विश्लेषकों की मानें, तो अन्ना हज़ारे अनशन का ग़लत इस्तेमाल कर राजनीतिक ब्लैकमेलिंग करते हैं और कई राजनीतिक विरोधियों ने अन्ना का इस्तेमाल किया है.
कुछ विश्लेषक अन्ना हज़ारे को निरंकुश बताते हैं और कहते हैं कि उनके संगठन में लोकतंत्र का नामोनिशां नहीं है.
सम्मान
पदम् भूषण अवार्ड (१९९२)
पदम श्री अवार्ड (११९०)
इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार (१९८६)
महाराष्ट्र सरकार का कृषि भूषण पुरस्कार (१९८९)
यंग इंडिया अवार्ड ()
मैन ऑफ़ द ईयर अवार्ड (१९८८)
पॉल मित्तल नेशनल अवार्ड (२०००)
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंटेग्रीटि अवार्ड (२००३)
विवेकानंद सेवा पुरुस्कार (१९९६)
शिरोमणि अवार्ड (१९९७)
महावीर पुरुस्कार (१९९७)
दिवालीबेन मेहता अवार्ड (१९९९)
केयर इन्टरनेशनल (१९९८)
BASAVSHRI PRASHASTI 2000 AWARD (२०००)
GIANTS INTERNATIONAL AWARD (२०००)
नेशनलइंटरग्रेसन अवार्ड (१९९९)
VISHWA-VATSALYA & SANTBAL AWARD ()
जनसेवा अवार्ड (१९९९)
ROTARY INTERNATIONAL MANAV SEVA PURASKAR (१९९८)
विश्व बैंक का 'जित गिल स्मारक पुरस्कार' (२००८)